गुरुवार, 27 जुलाई 2017

बिखरता-सँवरता बिहार

बिखरता-संवरता बिहार
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बेमेल थी यह जोड़ी इसे तो टूटना ही था
      "हठबंधन"के इस गाँठ को तो छूटना ही था
भरोसे की ये पतंग तो,पहले ही गई थी कट
     कटी जो पतंग तो बीजेपी को लूटना ही था!

-सुनिल शर्मा"नील"

रविवार, 23 जुलाई 2017

हमसे बिछड़ के भी


हमसे बिछड़ के वे हमारे पास रहेंगे
बनके सदा मन में सुखद अहसास रहेंगे
कहता है कौन "बाबूजी" हमें छोड़ गए है
बनकर के प्रेरणा सदा वे साथ रहेंगे!

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

मेरे सुपुत्र देव

मेरे सुपुत्र देव.............

आज रश्मि रथ है पर कल अग्नि पथ होगें बेटा !
              तुझे  हराने को आतुर  अनगिनत रथ होगें बेटा !
भूल न जाना कभी तू ,पाठ अभिमन्यु की तरह
           संघर्ष मंत्र से ही सफल तुम्हारे मनोरथ होगें बेटा !!

पापा ( सुनिल शर्मा नील )

भूल न जाना तू पाठ

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आज रश्मिपथ है पर कल अग्निपथ
होंगे बेटा
तुझे हराने को आतुर अनगिनत
रथ होंगे बेटा
भूल न जाना तू पाठ अभिमन्यु
की तरह
"संघर्ष मंत्र"से ही सफल पूरे मनोरथ
होंगे बेटा!
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मजदूर

          """मजदूर""""""
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पसीने से नहाया धूल धूसरीत वह मजदूर
सूर्य भी जिसके आगे सर झुकाता है
सृष्टि का हर विकास जिसकी देन है
आखिर क्यों अभावग्रस्त जीवन बिताता है?

रोटी की जुगत में खून पसीना एक करते
कभी खानों,मिलों,स्टेशनों में नजर आता है
हाड़तोड़ श्रम कर दो जून की रोटी जुटाता है
श्रमवीर वह पग-पग पे क्यों शोषित किया
जाता है?
सृष्टि का हर विकास...................

विडंबना तो देखो संसार की,,,
स्कूल मजदूर बनाता है उसके बच्चे शिक्षा से
दूर है
होटल मजदूर बनाता है उसके बच्चे भोजन से
दूर है
अस्पताल मजदूर बनाता है उसके बच्चे ईलाज
से दूर है
दूसरों को महल देने वाला झोपड़ी में पैदा होकर झोपड़ी में मर जाता है!
सृष्टि का हर विकास............

क्यों न हम एक नया समाज बनाए
कोई शोषित न हो जहाँ सबको अधिकार दिलाए
ऊंच नीच का भेद भुलाकर सबको गले लगाए
धर्म मानवता का हमें यही पथ तो दिखलाता है!
सृष्टि का हर विकास...............
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रचनाकार-सुनिल शर्मा"नील"
              थानखम्हरिया(छत्तीसगढ़)
               7828927284
                सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 19 जुलाई 2017

लड़ता देखा कोई कोई


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रोते हैं सब लोग धरा पर,हंसता देखा
कोई कोई
सहते है सब लोग यहाँ पर,लड़ता देखा
कोई कोई
जिसने खुद का मतलब समझा,इतिहास
वही तो लिख पाया
कहते है सब लोग यहाँ पर,करता देखा
कोई कोई
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सुनिल शर्मा"नील"
7828927284

पाँखों वाला कोई कोई

भौतिकता में अंधे सारे,आँखों वाला है
कोई कोई
पंख कुतरते एक दूजे के,पाँखों वाला है
कोई-कोई
ठूठ बचें है केवल अब तो वृक्ष नही तुम
पाओगे
मानवता के इस कानन में शाखों वाला है
कोई कोई