मंगलवार, 23 मई 2017

मानवता की परिभाषा ढूँढ़ रहा हूँ

*******************************
निराशा के गगन में एक आशा ढूँढ़ता हूँ मैं
नफरतों के चम में एक दिलासा ढूँढ़ता हूँ मैं
सिखाया था बुजुर्गों ने बड़े ही प्यार से जिसको
वो विस्मृत प्रेम की भाषा यहाँपर ढूँढ़ता हूँ मैं !
********************************

रविवार, 21 मई 2017

एक पिता से उसका

एक पिता से उसका,,,,,,
*****************************
अधरों से मुस्कान छीन ली उसकी है ।
दिल में जो अरमान छीन ली उसकी है ।
स्वार्थसिद्धि में आज किसी कैकई ने
दसरथ से संतान छीन ली उसकी  है ।
**********************

एक पिता से उसका

एक पिता से उसका,,,,,,
*****************************
अधरों से उसका मुस्कान छीना है
पौधे से उसका बागबान छीना है
स्वार्थसिद्धि में फिर किसी कैकई ने
एक पिता से उसका संतान छीना है!
*****************************
सुनिल शर्मा"नील"
थानखम्हरिया,बेमेतरा(छ.ग.)
7828927284

बुधवार, 17 मई 2017

मैं शिव तो शक्ति

******************************
मैं शिव तो शक्ति तुम हो
मैं साधना तो भक्ति तुम हो
मैं काव्य तो सार तुम हो
मैं वीणा तो तार तुम हो
मैं गीत तो राग तुम हो
मैं जीवन तो अनुराग तुम हो
मैं बसन्त तो बहार तुम हो
मैं सावन तो फुहार तुम हो
मैं सुगंध तो चंदन तुम हो
मैं हृदय तो स्पंदन तुम हो
मैं दीया तो ज्योत तुम हो
मैं नदी तो स्रोत तुम हो
मैं वाणी तो मिठास तुम हो
मैं प्यासा तो प्यास तुम हो.......
*******************************
बस अंत में यही कहना है प्रिये तुमसे
ही मैं हूँ, मेरे होने का अर्थ है तू नही तो सब व्यर्थ है,,,,,

मंगलवार, 9 मई 2017

बन सका कंचन

पहिनने वालों ने उसकी तपन शायद नहीं देखी ।
चमक देखी छिपी उसमें जलन शायद नहीं देखी ।
अँगारों को सहा जिसने वही बस बन सका कंचन ।
जमाने ने अंगीठी की अगन शायद नही देखी!

सोमवार, 8 मई 2017

फिर उड़ न पाया

******************
इतना टूटा कि फिर जुड़
न पाया
उन गलियों की ओर मुड़
न पाया
जिनसे हौसला था भरोसा
उसी ने तोड़ा
गिरा इस तरह पँछी की फिर
उड़ न पाया
********************
सुनिल शर्मा"नील"
ओजकवि,थानखम्हरिया,(छ. ग.)

लोभ बन गया धर्म

मानवता लज्जित यहाँ,सबके गंदे कर्म
पानी आंखों का मरा,लोभ बन गया धर्म