प्रदत्त पंक्ति-- खट्टे है अंगूर
मिलता फल कुछ भी नही श्रम बिन है दस्तूर |
कामचोर कहते सदा खट्टे है अंगूर |
खट्टे है अंगूर, स्वयं तप से ये डरते |
करते यहां प्रयास, बुराई उनकी करते |
कहे नील कविराय, फूल पत्थर में खिलता |
करते जो पुरुषार्थ, उन्हें जग मे सब मिलता ||
सुनिल शर्मा नील
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें