सिद्धि दाई के हवे, महिमा अपरमपार
जे हर आथे द्वार मा, होथे बेदापार
संडी नामक गाँव मा, बैठे देबी खार
जग ले हारे हा घलो, जीतय ये संसार
मेला कस रहिथे सदा, संतन के जी भीड़
भेदभाव ना माँ करे, हरथे सब के पीर
बारम्बार बोलो माता सिद्धि की जय(ऊपर के दोहा मन ला प्रआरम्भ मा बोले जा सकत हे)
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(कोरस)
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
अंतरा (1)
बड़ फुरमानुक हावय दाई सबके भाग संवारे
बेमेतरा के संडि गांव मा खार मा हवे पधारे
धरती अंबर हवा संग माँ के भक्ति मा डोलव रे
(कोरस)
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
रतिहा के चंदा कस चमकत माँ के रूप उजाला
मन हरथे संतन मन के बदरा कस चुंदी काला
माँ के मोहनी रूप मा अपन सुध बुध जम्मो खो लव रे
(कोरस)
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
अंतरा(3)
चैत कुंवार के नौ दिन दाई के गूँजे जयकारा
मेला लागय एकर दुवारी, बाजय ढ़ोल नगारा
आके सिद्धि धाम में सबझन अपन पाप ला धोलव रे
(कोरस)
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
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