शनिवार, 28 मार्च 2026

खट्टे हैं अंगूर


प्रदत्त पंक्ति-- खट्टे है अंगूर


मिलता फल कुछ भी नही श्रम बिन है दस्तूर |
कामचोर कहते सदा खट्टे है अंगूर |
खट्टे है अंगूर, स्वयं तप से ये डरते |
करते यहां प्रयास, बुराई उनकी करते |
कहे नील कविराय, फूल पत्थर में खिलता |
करते जो पुरुषार्थ, उन्हें जग मे सब मिलता ||


सुनिल शर्मा नील

रविवार, 22 मार्च 2026

सिद्धि माँ के जय बोलव (छत्तीसगढ़ी जसगीत )

सिद्धि दाई के हवे, महिमा अपरमपार 
जे हर आथे द्वार मा, होथे बेदापार

संडी नामक गाँव मा, बैठे देबी खार
जग ले हारे हा घलो, जीतय ये संसार

मेला कस रहिथे सदा, संतन के जी भीड़
भेदभाव ना माँ करे, हरथे सब के पीर

बारम्बार बोलो माता सिद्धि की जय(ऊपर के दोहा मन ला प्रआरम्भ मा बोले जा सकत हे)

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(कोरस)
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
सिद्धि माँ के जय बोलव रे


अंतरा (1)
बड़ फुरमानुक हावय दाई सबके भाग संवारे
बेमेतरा के संडि गांव मा खार मा हवे पधारे
धरती अंबर हवा संग माँ के भक्ति मा डोलव रे


(कोरस)
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
सिद्धि माँ के जय बोलव रे

रतिहा के चंदा कस चमकत माँ के रूप उजाला 
मन हरथे संतन मन के बदरा कस चुंदी काला 
माँ के मोहनी रूप मा अपन सुध बुध जम्मो खो लव रे

(कोरस)
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
सिद्धि माँ के जय बोलव रे

अंतरा(3)
चैत कुंवार के नौ दिन दाई के गूँजे जयकारा
मेला लागय एकर दुवारी, बाजय ढ़ोल नगारा
आके सिद्धि धाम में सबझन अपन पाप ला धोलव रे
(कोरस)
सिद्धि माँ के जय बोलव रे
सिद्धि माँ के जय बोलव रे









मंगलवार, 17 मार्च 2026

नकल vs मौलिकता


नकल vs मौलिकता 

खोया अपना रंग है, बनी नही पहचान |
दूजों की करके नकल, ढूंढ रहा था  मान |
ढूंढ रहा था मान, दिखावा उसको भाया |
मौलिकता को छोड़, रंग अपना बिसराया |
माया में फंस नील, रहा हरदम ही सोया |
अंदर जाना छोड़, रहा बाहर ही खोया ||

सुनिल शर्मा नील 
छत्तीसगढ़ 

रविवार, 15 मार्च 2026

गधा हुआ है ढेर कुंडलियां


गधा हुआ है ढेर

फूला था अभिमान में, खुद को समझा शेर |
आया जब सच सामने, गधा हुआ है ढेर |
गधा हुआ है ढेर, भरम सारा है टूटा |
बहुत दिखाया रौब, दंभ का गागर फूटा |
समय दिखाया सांच, रौब अब अपना भूला |
शर्मशार है आज, रहा करता था फूला || 


सुनिल शर्मा नील
गुवारा,छत्तीसगढ़

शनिवार, 14 मार्च 2026

मन को रखिए शुद्ध(कुंडलियां)

गंदे तजिए आचरण, मन को रखिए शुद्ध |
करना ऐसे काम तुम, हो ना कोई क्रुद्ध |
हो ना कोई क्रुद्ध, चार दिन लेकर आए |
कपट द्वेष अरु झूठ, डूब इनमें क्या पाए |
सदा सत्य की राह, धरे चलते जा बंदे |
जप हरिहर का नाम, छोड़ दे कारज गंदे ||

सुनिल शर्मा नील 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

दिन गर्मी के आए

मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए
धूप लगी है अब तो चुभने, छाँव सभी को भाए

बीते दिन सर्दी के भाई, कितना था ठिठुराया 
भाता था कंबल औ स्वेटर, प्राण अलाव बचाया
सुबह नहाते बेदर्दी ने ,नानी याद दिलाए
मौसम है कुछ बदला- बदला, दिन गर्मी के आए

कोहरे वाली भोर गई अब, फागुन रंग जमाए
मौर लगे आमों में सुंदर, कोयल कूक लगाए
खेतो में नाचे है सरसो ,टेसू नैन लुभाए
मौसम है कुछ बदला- बदला दिन गर्मी के आए

दोपहरी संकेत दे रही, सोच समझकर खाए 
सूनी होंगी सड़के गलियां, सूरज आंख दिखाए 
लू भी लैस खड़ा है भाई मत रहना भरमाए 
मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए।


नदियाँ ताल तलैया सारे, सूख रहे है सारे 
गर्मी में जीवों के होते थे ये कभी सहारे 
खुद संग फिक्र करें जीवों की मानव धर्म निभाए 
मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए ||


सुनिल शर्मा नील
गुवारा, थान खमरिया
छत्तीसगढ़

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

जीना हुआ हराम

जीना हुआ हराम

मानव तेरे पाप का, देख आज परिणाम |
जल थल सब विषमय हुए, जीना हुआ हराम |
जीना हुआ हराम, जहर वायु में फैला |
शक्ति में हो चूर, किया पृथ्वी को मैला |
हुआ स्वार्थ का दास, बना कलयुग का दानव |
भूला सहअस्तित्व, आज का लोभी मानव ||

सुनिल शर्मा नील
छत्तीसगढ़