रविवार, 15 मार्च 2026

गधा हुआ है ढेर कुंडलियां


गधा हुआ है ढेर

फूला था अभिमान में, खुद को समझा शेर |
आया जब सच सामने, गधा हुआ है ढेर |
गधा हुआ है ढेर, भरम सारा है टूटा |
बहुत दिखाया रौब, दंभ का गागर फूटा |
समय दिखाया सांच, रौब अब अपना भूला |
शर्मशार है आज, रहा करता था फूला || 


सुनिल शर्मा नील
गुवारा,छत्तीसगढ़

शनिवार, 14 मार्च 2026

मन को रखिए शुद्ध(कुंडलियां)

गंदे तजिए आचरण, मन को रखिए शुद्ध |
करना ऐसे काम तुम, हो ना कोई क्रुद्ध |
हो ना कोई क्रुद्ध, चार दिन लेकर आए |
कपट द्वेष अरु झूठ, डूब इनमें क्या पाए |
सदा सत्य की राह, धरे चलते जा बंदे |
जप हरिहर का नाम, छोड़ दे कारज गंदे ||

सुनिल शर्मा नील 

गुरुवार, 5 मार्च 2026

दिन गर्मी के आए

मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए
धूप लगी है अब तो चुभने, छाँव सभी को भाए

बीते दिन सर्दी के भाई, कितना था ठिठुराया 
भाता था कंबल औ स्वेटर, प्राण अलाव बचाया
सुबह नहाते बेदर्दी ने ,नानी याद दिलाए
मौसम है कुछ बदला- बदला, दिन गर्मी के आए

कोहरे वाली भोर गई अब, फागुन रंग जमाए
मौर लगे आमों में सुंदर, कोयल कूक लगाए
खेतो में नाचे है सरसो ,टेसू नैन लुभाए
मौसम है कुछ बदला- बदला दिन गर्मी के आए

दोपहरी संकेत दे रही, सोच समझकर खाए 
सूनी होंगी सड़के गलियां, सूरज आंख दिखाए 
लू भी लैस खड़ा है भाई मत रहना भरमाए 
मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए।


नदियाँ ताल तलैया सारे, सूख रहे है सारे 
गर्मी में जीवों के होते थे ये कभी सहारे 
खुद संग फिक्र करें जीवों की मानव धर्म निभाए 
मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए ||


सुनिल शर्मा नील
गुवारा, थान खमरिया
छत्तीसगढ़

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

जीना हुआ हराम

जीना हुआ हराम

मानव तेरे पाप का, देख आज परिणाम |
जल थल सब विषमय हुए, जीना हुआ हराम |
जीना हुआ हराम, जहर वायु में फैला |
शक्ति में हो चूर, किया पृथ्वी को मैला |
हुआ स्वार्थ का दास, बना कलयुग का दानव |
भूला सहअस्तित्व, आज का लोभी मानव ||

सुनिल शर्मा नील
छत्तीसगढ़

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

बदलावो का दौर

प्रणाम आदरणीय मंच
प्रदत्त पंक्ति-- बदलावों का दौर
विधा-- दोहा
दिनांक-- 18/02/2026

बदलावों का दौर है, मत होना तुम दंग |
अपना कोई आपको, अगर दिखाए रंग |

बदलावों का दौर है, बदलो खुद को आप |
बीत गया वह भूल जा, करो नही संताप ||

बदलावों का दौर है, तकनीकी संसार |
सीख सके ना जो इसे, समझो वो बेकार ||

बदलावों का दौर है, कम होते संस्कार |
नंगेपन का हो रहा, दुनिया में विस्तार ||

बदलावों का दौर है, ढूंढ रहा है प्यार |
संबंधो का आजकल, हुआ स्वार्थ आधार ||

सुनिल शर्मा नील 
गुवारा, थानखम्हरिया (छग )

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

ठनकर रहता संग्राम


निजी लोभ जब लोकतंत्र पर पड़ने लगता भारी हो |
माली से ही बाग उजाड़े जाने की तैयारी हो |
लाख प्रयत्न करे "केशव " ठनकर रहता संग्राम वहाँ|
जहां धर्म से ज्यादा नृप को कुर्सी लगती प्यारी हो ||


सुनिल शर्मा नील
छग
17/02/2026
Copyright

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

धीरे-धीरे घट रहा



धीरे-धीरे घट रहा

मानव मन है अब हुआ, लोभ द्वेष का गेह |
धीरे- धीरे घट रहा, लोगो मे अब स्नेह |
लोगो में अब स्नेह, प्रांत भाषा पर लड़ते |
रंग जात अरु पात, इन्ही पर आज झगड़ते |
प्रेम भाव को त्याग, हुआ है पापी दानव |
नही धर्म का मर्म, कहीं गायब है मानव ||

सुनिल शर्मा नील 
थान खम्हीरिया (छ्ग )