गुरुवार, 5 मार्च 2026

दिन गर्मी के आए

मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए
धूप लगी है अब तो चुभने, छाँव सभी को भाए

बीते दिन सर्दी के भाई, कितना था ठिठुराया 
भाता था कंबल औ स्वेटर, प्राण अलाव बचाया
सुबह नहाते बेदर्दी ने ,नानी याद दिलाए
मौसम है कुछ बदला- बदला, दिन गर्मी के आए

कोहरे वाली भोर गई अब, फागुन रंग जमाए
मौर लगे आमों में सुंदर, कोयल कूक लगाए
खेतो में नाचे है सरसो ,टेसू नैन लुभाए
मौसम है कुछ बदला- बदला दिन गर्मी के आए

दोपहरी संकेत दे रही, सोच समझकर खाए 
सूनी होंगी सड़के गलियां, सूरज आंख दिखाए 
लू भी लैस खड़ा है भाई मत रहना भरमाए 
मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए।


नदियाँ ताल तलैया सारे, सूख रहे है सारे 
गर्मी में जीवों के होते थे ये कभी सहारे 
खुद संग फिक्र करें जीवों की मानव धर्म निभाए 
मौसम है कुछ बदला-बदला, दिन गर्मी के आए ||


सुनिल शर्मा नील
गुवारा, थान खमरिया
छत्तीसगढ़

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

जीना हुआ हराम

जीना हुआ हराम

मानव तेरे पाप का, देख आज परिणाम |
जल थल सब विषमय हुए, जीना हुआ हराम |
जीना हुआ हराम, जहर वायु में फैला |
शक्ति में हो चूर, किया पृथ्वी को मैला |
हुआ स्वार्थ का दास, बना कलयुग का दानव |
भूला सहअस्तित्व, आज का लोभी मानव ||

सुनिल शर्मा नील
छत्तीसगढ़

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

बदलावो का दौर

प्रणाम आदरणीय मंच
प्रदत्त पंक्ति-- बदलावों का दौर
विधा-- दोहा
दिनांक-- 18/02/2026

बदलावों का दौर है, मत होना तुम दंग |
अपना कोई आपको, अगर दिखाए रंग |

बदलावों का दौर है, बदलो खुद को आप |
बीत गया वह भूल जा, करो नही संताप ||

बदलावों का दौर है, तकनीकी संसार |
सीख सके ना जो इसे, समझो वो बेकार ||

बदलावों का दौर है, कम होते संस्कार |
नंगेपन का हो रहा, दुनिया में विस्तार ||

बदलावों का दौर है, ढूंढ रहा है प्यार |
संबंधो का आजकल, हुआ स्वार्थ आधार ||

सुनिल शर्मा नील 
गुवारा, थानखम्हरिया (छग )

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

ठनकर रहता संग्राम


निजी लोभ जब लोकतंत्र पर पड़ने लगता भारी हो |
माली से ही बाग उजाड़े जाने की तैयारी हो |
लाख प्रयत्न करे "केशव " ठनकर रहता संग्राम वहाँ|
जहां धर्म से ज्यादा नृप को कुर्सी लगती प्यारी हो ||


सुनिल शर्मा नील
छग
17/02/2026
Copyright

सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

धीरे-धीरे घट रहा



धीरे-धीरे घट रहा

मानव मन है अब हुआ, लोभ द्वेष का गेह |
धीरे- धीरे घट रहा, लोगो मे अब स्नेह |
लोगो में अब स्नेह, प्रांत भाषा पर लड़ते |
रंग जात अरु पात, इन्ही पर आज झगड़ते |
प्रेम भाव को त्याग, हुआ है पापी दानव |
नही धर्म का मर्म, कहीं गायब है मानव ||

सुनिल शर्मा नील 
थान खम्हीरिया (छ्ग )

मतलब के रिश्ते है जग में


देखे हमने दुनियावाले, देखी दुनियादारी 
मतलब के है रिश्ते जग में, मतलब की है यारी ||


दिल में अपने रखते खंजर, ऊपर मीठी बाते
जय-जयकार करे है सम्मुख,पीछे रंग दिखाते
सुख में झूमे संग हमारे दुख में दूरी भारी
मतलब के रिश्ते है जग में, मतलब की है यारी ।

जिसपर होता हमें भरोसा, करता है गद्दारी
जिसको मानो अपना वो ही, सुलगाता चिंगारी
विपत काल में हाथ खडे कर, दिखलाते लाचारी
मतलब के रिश्ते है जग में, मतलब की है यारी ।।

झूठी शान दिखावे वाली, अंदर से सब खाली,
अपनेपन का चोला ओढ़े, नीयत लेकिन काली,
सच्चे मन का मोल नही अब, झूठ सत्य परभारी
मतलब के है रिश्ते जग में, मतलब की है यारी ।|


सुनिल शर्मा नील 
छत्तीसगढ़ 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

क्यूकर हमें बिसारा है?

क्योंकर हमें बिसारा है?


भारत माता बोली—कब तक घावों पर पर्दा डालूँ
कृतघ्नता आकंठ भरी जिनमें, उनको मैं क्यों पालूँ
बोस, कुँवर, मंगल पांडे, तात्या टोपे, झाँसी रानी
भगत, राज, सुखदेव कहें—क्यों मरा आँख का है पानी
नींव बने हम आज़ादी के, भूले सारे उपकार हो क्यों
लहू मोल आज़ादी दी, फिर भी भूले आभार हो क्यों
स्वर्गलोक से बलिदानी, गुमनामों ने धिक्कारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


रंग-रूप, जाति-पाँति पर, अब भी आपस में लड़ते हो
जिस शोषण से लड़े थे हम, अब एक-दूजे का करते हो
रहे बराबर—सबजन था जो, स्वप्न अधूरा अब तक है
ऊँच-नीच की खाई अब तक, हिंसा-दंगा अब तक है
अब भी असमत लूटती है, भ्रष्टों की अब भी चाँदी है
संसद में संवाद कहाँ है, जनधन की बर्बादी है
जिसको माली का काम दिया, उसने ही बाग़ उजारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


वोट-बैंक की खातिर देखो नेता कैसा गिद्ध बना
अनपढ़ भी आडंबर करके, सिंहासन पर सिद्ध बना
देश के टुकड़े करने वाले, नारे अब भी जारी हैं
विष-बुझे भाषणों पर जाने, कैसी यह लाचारी है
स्वार्थ की खातिर वोट-बेंच, खुद जला रहे घर अपना
देखा था जो हमने मिलकर—तोड़ रहे हर एक सपना
उसे भगाओ चुन-चुनकर, जो मानवता का हत्यारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?

सुनिल शर्मा नील 
छ्ग 
9522651567