निजी लोभ जब लोकतंत्र पर पड़ने लगता भारी हो |
माली से ही बाग उजाड़े जाने की तैयारी हो |
लाख प्रयत्न करे "केशव " ठनकर रहता संग्राम वहाँ|
जहां धर्म से ज्यादा नृप को कुर्सी लगती प्यारी हो ||
सुनिल शर्मा नील
छग
17/02/2026
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गंगा करे सवाल
गंगा करें सवाल यह, आँखों में भर नीर |
किन बातों की मिल रही, मुझे कहो ये पीर |
मुझे कहो ये पीर, सभी कुछ तुमपे वारा |
दूषित करके नील, मुझे क्यों आज बिसारा |
धोकर सबके पाप, सभी को करके चंगा |
हुई आज असहाय, तुम्हारी माता गंगा ||
सुनिल शर्मा नील
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