सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

धीरे-धीरे घट रहा



धीरे-धीरे घट रहा

मानव मन है अब हुआ, लोभ द्वेष का गेह |
धीरे- धीरे घट रहा, लोगो मे अब स्नेह |
लोगो में अब स्नेह, प्रांत भाषा पर लड़ते |
रंग जात अरु पात, इन्ही पर आज झगड़ते |
प्रेम भाव को त्याग, हुआ है पापी दानव |
नही धर्म का मर्म, कहीं गायब है मानव ||

सुनिल शर्मा नील 
थान खम्हीरिया (छ्ग )

मतलब के रिश्ते है जग में


देखे हमने दुनियावाले, देखी दुनियादारी 
मतलब के है रिश्ते जग में, मतलब की है यारी ||


दिल में अपने रखते खंजर, ऊपर मीठी बाते
जय-जयकार करे है सम्मुख,पीछे रंग दिखाते
सुख में झूमे संग हमारे दुख में दूरी भारी
मतलब के रिश्ते है जग में, मतलब की है यारी ।

जिसपर होता हमें भरोसा, करता है गद्दारी
जिसको मानो अपना वो ही, सुलगाता चिंगारी
विपत काल में हाथ खडे कर, दिखलाते लाचारी
मतलब के रिश्ते है जग में, मतलब की है यारी ।।

झूठी शान दिखावे वाली, अंदर से सब खाली,
अपनेपन का चोला ओढ़े, नीयत लेकिन काली,
सच्चे मन का मोल नही अब, झूठ सत्य परभारी
मतलब के है रिश्ते जग में, मतलब की है यारी ।|


सुनिल शर्मा नील 
छत्तीसगढ़ 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

क्यूकर हमें बिसारा है?

क्योंकर हमें बिसारा है?


भारत माता बोली—कब तक घावों पर पर्दा डालूँ
कृतघ्नता आकंठ भरी जिनमें, उनको मैं क्यों पालूँ
बोस, कुँवर, मंगल पांडे, तात्या टोपे, झाँसी रानी
भगत, राज, सुखदेव कहें—क्यों मरा आँख का है पानी
नींव बने हम आज़ादी के, भूले सारे उपकार हो क्यों
लहू मोल आज़ादी दी, फिर भी भूले आभार हो क्यों
स्वर्गलोक से बलिदानी, गुमनामों ने धिक्कारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


रंग-रूप, जाति-पाँति पर, अब भी आपस में लड़ते हो
जिस शोषण से लड़े थे हम, अब एक-दूजे का करते हो
रहे बराबर—सबजन था जो, स्वप्न अधूरा अब तक है
ऊँच-नीच की खाई अब तक, हिंसा-दंगा अब तक है
अब भी असमत लूटती है, भ्रष्टों की अब भी चाँदी है
संसद में संवाद कहाँ है, जनधन की बर्बादी है
जिसको माली का काम दिया, उसने ही बाग़ उजारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


वोट-बैंक की खातिर देखो नेता कैसा गिद्ध बना
अनपढ़ भी आडंबर करके, सिंहासन पर सिद्ध बना
देश के टुकड़े करने वाले, नारे अब भी जारी हैं
विष-बुझे भाषणों पर जाने, कैसी यह लाचारी है
स्वार्थ की खातिर वोट-बेंच, खुद जला रहे घर अपना
देखा था जो हमने मिलकर—तोड़ रहे हर एक सपना
उसे भगाओ चुन-चुनकर, जो मानवता का हत्यारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?

सुनिल शर्मा नील 
छ्ग 
9522651567

गंगा करे सवाल


गंगा करे सवाल

गंगा करें सवाल यह, आँखों में भर नीर |
किन बातों की मिल रही, मुझे कहो ये पीर |
मुझे कहो ये पीर, सभी कुछ तुमपे वारा |
दूषित करके नील, मुझे क्यों आज बिसारा |
धोकर सबके पाप, सभी को करके चंगा |
हुई आज असहाय, तुम्हारी माता गंगा ||

सुनिल शर्मा नील


गुवारा (छग )

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रहे सदा सहयोग

रहे सदा सहयोग

बिखरे केवल प्यार ही, मिटे कलह के रोग |
हृदयों में मत खार हो, रहे सदा सहयोग |
रहे सदा सहयोग, खिले विश्वास की क्यारी |
हाथों में हो हाथ, रहे सबमें खुद्दारी |
करे सभी वह काम, देश जिससे यह सँवरे |
खुशियों के सब रंग, सदा भारत में बिखरे ||

सुनिल शर्मा नील 
गुवारा,छत्तीसगढ़ 

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

जो बोया सो काट

जो बोया सो काट


बाँटा था सबको जहर, वही रहा है चाँट |
करनी का फल मिल रहा, जो बोया सो काट |
जो बोया सो काट, भुगतना यही पड़ेगा |
नहीं मिलेगा मोक्ष, मूढ तू यही सड़ेगा |
कर ले पश्चाताप, बहुत बोया है काँटा |
वही पा रहा आज, कभी जो तूने बाँटा |


सुनिल शर्मा नील 
गुवारा, थानखमरिया (छत्तीसगढ़ )

रविवार, 25 जनवरी 2026

क्योंकर हमें बिसारा है?

क्योंकर हमें बिसारा है?


भारत माता बोली—कब तक घावों पर पर्दा डालूँ
कृतघ्नता आकंठ भरी जिनमें, उनको मैं क्यों पालूँ
बोस, कुँवर, मंगल पांडे, तात्या टोपे, झाँसी रानी
भगत, राज, सुखदेव कहें—क्यों मरा आँख का है पानी
नींव बने हम आज़ादी के, भूले सारे उपकार हो क्यों
लहू मोल आज़ादी दी, फिर भी भूले आभार हो क्यों
स्वर्गलोक से बलिदानी, गुमनामों ने धिक्कारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


रंग-रूप, जाति-पाँति पर, अब भी आपस में लड़ते हो
जिस शोषण से लड़े थे हम, अब एक-दूजे का करते हो
रहे बराबर—सबजन था जो, स्वप्न अधूरा अब तक है
ऊँच-नीच की खाई अब तक, हिंसा-दंगा अब तक है
अब भी असमत लूटती है, भ्रष्टों की अब भी चाँदी है
संसद में संवाद कहाँ है, जनधन की बर्बादी है
जिसको माली का काम दिया, उसने ही बाग़ उजारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


वोट-बैंक की खातिर देखो नेता कैसा गिद्ध बना
अनपढ़ भी आडंबर करके, सिंहासन पर सिद्ध बना
देश के टुकड़े करने वाले, नारे अब भी जारी हैं
विष-बुझे भाषणों पर जाने, कैसी यह लाचारी है
स्वार्थ की खातिर वोट-बेंच, खुद जला रहे घर अपना
देखा था जो हमने मिलकर—तोड़ रहे हर एक सपना
उसे भगाओ चुन-चुनकर, जो मानवता का हत्यारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?

सुनिल शर्मा नील 
छ्ग 
9522651567