मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

ठनकर रहता संग्राम


निजी लोभ जब लोकतंत्र पर पड़ने लगता भारी हो |
माली से ही बाग उजाड़े जाने की तैयारी हो |
लाख प्रयत्न करे "केशव " ठनकर रहता संग्राम वहाँ|
जहां धर्म से ज्यादा नृप को कुर्सी लगती प्यारी हो ||


सुनिल शर्मा नील
छग
17/02/2026
Copyright

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें