धीरे-धीरे घट रहा
मानव मन है अब हुआ, लोभ द्वेष का गेह |
धीरे- धीरे घट रहा, लोगो मे अब स्नेह |
लोगो में अब स्नेह, प्रांत भाषा पर लड़ते |
रंग जात अरु पात, इन्ही पर आज झगड़ते |
प्रेम भाव को त्याग, हुआ है पापी दानव |
नही धर्म का मर्म, कहीं गायब है मानव ||
सुनिल शर्मा नील
थान खम्हीरिया (छ्ग )
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