मंगलवार, 27 जनवरी 2026

क्यूकर हमें बिसारा है?

क्योंकर हमें बिसारा है?


भारत माता बोली—कब तक घावों पर पर्दा डालूँ
कृतघ्नता आकंठ भरी जिनमें, उनको मैं क्यों पालूँ
बोस, कुँवर, मंगल पांडे, तात्या टोपे, झाँसी रानी
भगत, राज, सुखदेव कहें—क्यों मरा आँख का है पानी
नींव बने हम आज़ादी के, भूले सारे उपकार हो क्यों
लहू मोल आज़ादी दी, फिर भी भूले आभार हो क्यों
स्वर्गलोक से बलिदानी, गुमनामों ने धिक्कारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


रंग-रूप, जाति-पाँति पर, अब भी आपस में लड़ते हो
जिस शोषण से लड़े थे हम, अब एक-दूजे का करते हो
रहे बराबर—सबजन था जो, स्वप्न अधूरा अब तक है
ऊँच-नीच की खाई अब तक, हिंसा-दंगा अब तक है
अब भी असमत लूटती है, भ्रष्टों की अब भी चाँदी है
संसद में संवाद कहाँ है, जनधन की बर्बादी है
जिसको माली का काम दिया, उसने ही बाग़ उजारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


वोट-बैंक की खातिर देखो नेता कैसा गिद्ध बना
अनपढ़ भी आडंबर करके, सिंहासन पर सिद्ध बना
देश के टुकड़े करने वाले, नारे अब भी जारी हैं
विष-बुझे भाषणों पर जाने, कैसी यह लाचारी है
स्वार्थ की खातिर वोट-बेंच, खुद जला रहे घर अपना
देखा था जो हमने मिलकर—तोड़ रहे हर एक सपना
उसे भगाओ चुन-चुनकर, जो मानवता का हत्यारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?

सुनिल शर्मा नील 
छ्ग 
9522651567

जो बोया सो काट

जो बोया सो काट


बाँटा था सबको जहर, वही रहा है चाँट |
करनी का फल मिल रहा, जो बोया सो काट |
जो बोया सो काट, भुगतना यही पड़ेगा |
नहीं मिलेगा मोक्ष, मूढ तू यही सड़ेगा |
कर ले पश्चाताप, बहुत बोया है काँटा |
वही पा रहा आज, कभी जो तूने बाँटा |


सुनिल शर्मा नील 
गुवारा, थानखमरिया (छत्तीसगढ़ )

रविवार, 25 जनवरी 2026

क्योंकर हमें बिसारा है?

क्योंकर हमें बिसारा है?


भारत माता बोली—कब तक घावों पर पर्दा डालूँ
कृतघ्नता आकंठ भरी जिनमें, उनको मैं क्यों पालूँ
बोस, कुँवर, मंगल पांडे, तात्या टोपे, झाँसी रानी
भगत, राज, सुखदेव कहें—क्यों मरा आँख का है पानी
नींव बने हम आज़ादी के, भूले सारे उपकार हो क्यों
लहू मोल आज़ादी दी, फिर भी भूले आभार हो क्यों
स्वर्गलोक से बलिदानी, गुमनामों ने धिक्कारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


रंग-रूप, जाति-पाँति पर, अब भी आपस में लड़ते हो
जिस शोषण से लड़े थे हम, अब एक-दूजे का करते हो
रहे बराबर—सबजन था जो, स्वप्न अधूरा अब तक है
ऊँच-नीच की खाई अब तक, हिंसा-दंगा अब तक है
अब भी असमत लूटती है, भ्रष्टों की अब भी चाँदी है
संसद में संवाद कहाँ है, जनधन की बर्बादी है
जिसको माली का काम दिया, उसने ही बाग़ उजारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?


वोट-बैंक की खातिर देखो नेता कैसा गिद्ध बना
अनपढ़ भी आडंबर करके, सिंहासन पर सिद्ध बना
देश के टुकड़े करने वाले, नारे अब भी जारी हैं
विष-बुझे भाषणों पर जाने, कैसी यह लाचारी है
स्वार्थ की खातिर वोट-बेंच, खुद जला रहे घर अपना
देखा था जो हमने मिलकर—तोड़ रहे हर एक सपना
उसे भगाओ चुन-चुनकर, जो मानवता का हत्यारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?

सुनिल शर्मा नील 
छ्ग 
9522651567

सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

कहे नील कविराय -2



सरस्वती वंदना (कुंडलिया 2)

सादर वंदन आपकी, करूँ झुकाकर माथ |
हे माँ वाणी नील का, नही छोड़ना हाथ ||
नही छोड़ना हाथ, रचूँ जो भी मैं कविता |
सबको लागे नीक, लगे पावन ज्यों सरिता ||
भाव शिल्प हो श्रेष्ठ, समाहित सबका आदर |
कविता ऐसी मातु , रचूँ मैं अनुनय सादर ||

सुनिल शर्मा नील
गुवारा, थान खाम्हरिया (छत्तीसगढ़)




शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

कहे नील कविराय 1



जय गणेश देवा
कहे नील कविराय 
कुंडलिया 1

वंदन करता दास यह, सुनो नाथ गणराज 
वर देना इस नील को, पूरन हो सब काज 
पूरन हो सब काज, विघ्न कोई मत आये 
सृजन कराओ आप, ह्रदय जो सबके भाये 
पहला मेरा प्रयास, महक जाए जस चंदन 
करो कृपा हे वीर, करूँ मैं सादर वंदन

सुनिल शर्मा नील
गुवारा, थान खम्हरिया(छत्तीसगढ़ )

मंगलवार, 2 सितंबर 2025

बिगड़ा आज समाज


आंखों का पानी मरा, गई शरम औ लाज |
गलती कर कहते युवा, बिगड़ा आज समाज ||

युवा भ्रमित दिखता मुझे, देखूं जिस भी ओर |
कब तम का अवसान हो , कब आएगी भोर ||

छोटे होते वस्त्र औ, खोए है संस्कार |
नंगापन फैशन बना, भ्रमित हुए नर नार ||

गंदे गीतों पर युवा, बना रहे है रील |
अनुनय है मां बाप से , मत दो इतनी ढील ||

प्रेम शब्द का अर्थ ये, जाने ना मतिमंद |
तरुणाई को खो रहे, होकर अति स्वच्छंद ||

मोबाइल के रोग से, पीड़ित है संसार |
नैतिकता के नाव से , होगा बेड़ापार ||

स्वरचित/मौलिक
सुनिल शर्मा नील
गुवारा,थान ख़म्हरिया(छत्तीसगढ़)

बुधवार, 28 अगस्त 2024

पापा

बहुत मन था मुझे बचपन सा गोदी में बिठाते फिर |
सबल कंधों में लटकाकर मुझे झूला झूलते
फिर |
अधूरी अब रहेंगी ये मेरी ख्वाहिश सदा पापा
|
बहुत मन था मुझे सीने से बेटा कह लगाते तुम
||

सुनिल शर्मा नील