क्योंकर हमें बिसारा है?
भारत माता बोली—कब तक घावों पर पर्दा डालूँ
कृतघ्नता आकंठ भरी जिनमें, उनको मैं क्यों पालूँ
बोस, कुँवर, मंगल पांडे, तात्या टोपे, झाँसी रानी
भगत, राज, सुखदेव कहें—क्यों मरा आँख का है पानी
नींव बने हम आज़ादी के, भूले सारे उपकार हो क्यों
लहू मोल आज़ादी दी, फिर भी भूले आभार हो क्यों
स्वर्गलोक से बलिदानी, गुमनामों ने धिक्कारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?
रंग-रूप, जाति-पाँति पर, अब भी आपस में लड़ते हो
जिस शोषण से लड़े थे हम, अब एक-दूजे का करते हो
रहे बराबर—सबजन था जो, स्वप्न अधूरा अब तक है
ऊँच-नीच की खाई अब तक, हिंसा-दंगा अब तक है
अब भी असमत लूटती है, भ्रष्टों की अब भी चाँदी है
संसद में संवाद कहाँ है, जनधन की बर्बादी है
जिसको माली का काम दिया, उसने ही बाग़ उजारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?
वोट-बैंक की खातिर देखो नेता कैसा गिद्ध बना
अनपढ़ भी आडंबर करके, सिंहासन पर सिद्ध बना
देश के टुकड़े करने वाले, नारे अब भी जारी हैं
विष-बुझे भाषणों पर जाने, कैसी यह लाचारी है
स्वार्थ की खातिर वोट-बेंच, खुद जला रहे घर अपना
देखा था जो हमने मिलकर—तोड़ रहे हर एक सपना
उसे भगाओ चुन-चुनकर, जो मानवता का हत्यारा है
कर्णधार भारत के बोलो—क्योंकर हमें बिसारा है?
सुनिल शर्मा नील
छ्ग
9522651567
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