राजभासा
ईमानदार मनखे ल जइसे गरब हे
ईमान म
इज्जतदार मनखे ल जइसे गरब हे
मान म
मोर तो सरबस मोर गुरतुर भाखा
छत्तीसगढ़ी
जतका बोलिहव कम हे ए भाखा
के बखान म|
सुनिल शर्मा"नील"
थान खम्हरिया
28/11/2015
CR
राजभासा
ईमानदार मनखे ल जइसे गरब हे
ईमान म
इज्जतदार मनखे ल जइसे गरब हे
मान म
मोर तो सरबस मोर गुरतुर भाखा
छत्तीसगढ़ी
जतका बोलिहव कम हे ए भाखा
के बखान म|
सुनिल शर्मा"नील"
थान खम्हरिया
28/11/2015
CR
(भारतभूमि को असहिष्णु कहकर अपमानित करने वाले बॉलीवुड के एक अभिनेता के बयान पर आक्रोश प्रकट करती थान खम्हरिया,छत्तीसगढ़ के कवि सुनिल शर्मा"नील" की रचना)
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जब तुमने सत्यमेव जयते का नारा गाया
था
इसी देश ने तुमको अपने सर आँखों पे बिठाया था
हर अभिनय पे देश ने मेंरे जीभर तुमको प्यार दिया
देश का बेटा मानके अपना तुमपे सब कुछ वार दिया
पर तुमने बातों के आग से देश का झंडा फूँक दिया
जिस जनता ने मान दिया उनके ऊपर ही थूक दिया
स्वार्थ हुआ पूरा जैसे ही देश असहिष्णु लगने लगा
इनक्रेडिबल भारत में तुमको बोलो भय क्यों लगने लगा
माना "गजनी"हो तुम तुमको भूलने की बीमारी
है
लेकिन बोलो स्वार्थ तुम्हारा क्या मातृभूमि से भारी है
शारदापुत्र कहता हूँ "नायक" कतई नही हो सकते तुम
जिस माटी ने तुम्हे बनाया उसके कर्णधार नही हो सकते तुम
आड़ लुगाई का लेकर के आग लगाने निकले
हो
बोलो आखिर किस आका का नमक चुकाने निकले हो
जो भारत का नहीं उसके हम कैसे हो सकते
है
जाओ पाक,ईराक-सीरिया तुमको ना ढो सकते है
जब देखोगे वहाँ रक्त तब याद करोगे भारत
को
इस मिट्टी के कण-कण में बसते लोगो की शराफत को
याद करोगे असल सहिष्णु भारत को ही कहते
है
रंगबिरंगे फूल जहाँ पर माला बनकर रहते
है|
(ईमानदार और माँ भारती के लाल बिना काट-छाँट के शेयर करें)
सुनिल शर्मा नील-
7828927284
रचना दिनाँक-25/11/2015
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""प्यार न छीन जाए""
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
माली के हाथों बहार छीन न
जाए
फूलो से गंध का अधिकार छीन न
जाए
पिस न पाए बचपन कहीं वैचारीक
संघर्षों में
माँ-पिता से ही बच्चों का संसार
न छीन जाए|
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सुनिल शर्मा"नील"
थान खम्हरिया,बेमेतरा
७८२८९२७२८४
CR
25/12/2015
भूत से ,वर्तमान से, आज से ,कल से बेवफाई तले बीते हर एक पल से नफरत है मुझे
घृणा है उन सभी से जिन्होंने मुझे सिर्फ सताया है अपने जिद के लिए
वेदना देकर बनाया है मुझे पाषाण
पाषाण जो निष्प्राण है,प्राण होकर भी!जो न बन पाएगा कभी सुघड़ मूर्ति और
किया है तप्त कोयले की तरह जो दग्ध है पीड़ा से
जिसके भाग्य में लिखा है जलकर अंततोगत्वा राख हो जाना
जिसके हृदय को निचोड़ा गया है इतना कि नयन संपुट भी शुष्क है
बना दिया है मरुभूमि सा जो हर घुमड़ते बादल से पूछता है पता खुशियों की
खुशियों के बारिश की जिसमे मिली हो वफ़ा की सौंधी गन्ध
जिससे सुख मिल सके मरूभूमि को अपने नन्हे नवोद्भिद को देखने का
अपने वक्ष में विकसित होता ,हवा के झोंको में हिलते देखने का
बस इसीआस में पसरा हुआ है बाहों में गर्म रेत लिए
ताकि एक दिन तरस आये उस विधाता को उसकी तपन पर
और भीगा दे उसे अपने अनगिनत जलबूंदों से मिलाने उस नन्हे "पौधे से"|
सुनिल शर्मा "नील"
थान खम्हरिया,बेेमेतरा
7828927284
रचना-21/11/2015
CR
मैं वह फूल हूँ जो रौंदा गया हूँ किसी के पैरो तले निर्दयता से
लगाया गया हूँ ठप्पा अपराधी का
जला हूँ किसी के व्यर्थ क्रोधानल में
पाया हूँ तिरष्कार की अनंत पीड़ा
डाला गया हूँ चिंतन के अँधेरे कूप में
चला हूँ परीक्षा के अंगारो पर सौ बार
उड़ा हूँ खुद की खोज में सूने आकाश में
उस कारण की खोज में जिसमे खुद के अकेलेपन का हेतु उपस्थित है
नजरियों के और नजरों के बदलने का उत्तर निहित है
जीया हूँ एक-एक पल में सदियों के समय को तड़पाया गया हूँ हर पल के द्वारा किसी अपराधी की तरह
पूछा गया हूँ गाँव के गलियो,तालाब,वृक्षों,साथियों से
कि अब क्यों तू चुप-चुप रहता है
खुद में घुलता हुआ सा
मोम सा पिघलता हुआ सा,
क्यों नहीं दिखता वो शख्स जो कभी तुझमे होता था
अल्हड़ सा मासूम,रमता और बिलकुल ही बेफिक्र|
सुनिल शर्मा "नील" थान खम्हरिया,बेमेतरा(छ.ग.)
7828927284
9755554470
रचना-09/07/2015
आतंकवाद के सेती देखव भुइया लाल होत हे एखर सेती मनखेपन सुसक-सुसक के रोत हे
नाननान लईका ल लुढहार आतँकी बनात हे कोंवर-कोंवर हाथ म मउत के समान धरात हे अ,आ,इ के जघा लईकामन जेहाद सीखत हे खेले खाय के उमर म आँखी म लहू दिखत हे
७० हूर ,जन्नत के लालच म आतंकी बनजात हे बिन बिचारे दूसर ल मारे बर खुद ल उड़ात हे बगदादी,दाऊद,हाफिज इखर आका के नाव हे कतको दाई के कोरा म इखर पाप के दे घाव हे दाई ले बेटा,बहिनी ले भाई,लईका ले बापलूटत हे दुनियाभर म इखर चेला मउत बाँटत घूमत हे जाने कहा ले पाथे पइसा आतंक फइलायबर सिधवा मनखे ल मास के लोथड़ा बनाय बर जम्मों आँखी म डर हे मनखे निकले म डर्रात हे फटाका घलो फुटत हे तेन म सब काँप जात हे आतंकवाद हरय अमरबेल पोसइया ल खात हे पाकिस्तान, सीरिया सांप पोस के पछतात हे इस्लाम ल घलो हत्यारा मन बदनाम करत हे दुनियाभर म मजहबी दंगा के जहर ल घोरतहे अब समय आगेहे सब मिलके कमर कसबो हत्यारामन के नास करेबर मिलके आघु बढ़बो कुलूप अंधियार हारही जब सुरूज कस बरबो चैन के सांस नइलन एखर जड़मूल नास करबो| सुनिल शर्मा "नील"
थान खम्हरिया,बेमेतरा
7828927284
9755554470
CR
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"देवउठनी"जइसे कि नाव ले पता चलत हे,अइसन एकादसी जेन दिन देव मन नींद ले उठथे देवउठनी एकादसी कहाथे|आज के दिन बिस्नु जी अउ जम्मों देवतामन अपन नींद ले उठथे|सास्त्र म अउ सनातनी हिन्दू परमपरा म देवउठनी एकादसी के अड़बड़ महत्व हे|आजे के दिन ले जम्मों मंगल काम(बर-बिहाव,घर पूजा,पचिस्था ,झालर उतारना जम्मों)होय बर चालु होथे|एखर ले पहिली देव मन के सुते के सेती मंगल काम नइ करे जाय|
"सालिग्राम अउ तुलसी माता के होथे बिहाव"
आजे के दिन भगवान् सालीग्राम अउ तुलसी माता के बिहाव होथे|जम्मों मनखे तुलसी चौरा ल गन्ना डांग म सजा के अउ गन्ना के मँढ़प बनाके सुग्घर लाइट, झालर,दीया म सजा के घर म रखे किसन कन्हैया के छोटकन मूरति ल लान के तुलसी चौरा म बिहाव कराथे|पान,फूल,नरियर अउ मउसमी फल चढ़ाथे,सुग्घर बिधि बिधान ले जोड़ी संग आरती उतारे जाथे अउ घर परवार के सुख सांति बर असीस माँगथे|हमर संस्कीरति म तुलसी ल सबले पबरीत देबी माने गेहे|
हर छत्तीसगढ़िया मनखे अउ हिन्दू भाई बहिनी मन के अंगना म एखर बास रहिथे|बिन तुलसी घर ल मरघटी माने गेहे|अड़बड़ अकन देवता मन म तुलसी बिन भोग नइ लगय|बिन तुलसी बिन कलजुग के डोंगा पार नइ होवय अइसन केहे गे हे| "तुलसी बिहाव के कथा" भागवत के अनसार तुलसी ह जालंधर राक्षत के गोसइन रिहिसे|भगवान् बिस्नु ह अपन जोगमाया म करके ओखर वध करीस|पति के वध के बाद तुलसी जउन पतिबरता अउ सती रहिसे अपन आप ल भसम कर लिस |ओखर भस्में ह तुलसी के झाड़ बनिस अइसे कहे जाथे|भगवान् बिसनु ह ओखर पतिवरता धरम ले अड़बड़ परसन होइस अउ अपन अरधानगनी रूप म ओला सिवकार करीस|बिसनू जी ह वरदान दिस की जेन मनखे मोर गोपाल जी(लड्डू गोपाल )म तुलसी चढ़ाही अउ मोर बिहाव तुलसी संग जेठवनी के दिन कराही ओला बैकुंठ मिलही तेखरे सेती आज के दिन तुलसी अउ सालिग्राम के बिहाव करे जाथे|
"गन्ना(कुसियार)के रहिथे बिसेस मांग"
आज के दिन पूजा म कुसियार के बिसेस मांग रहिथे|तुलसी दाई के मंडप ल कुसियार म सजाय जाथे|आज के दिन कुसियार चारो मुड़ा बजार म देखे बर मिलतेहे|मनखे मन पूजा म एखर महतव देखके आज के दिन कुसियार बिसाथे| लईका मन पूजा के बिहान दिन रसदार कुसियार ल चुहक-चुहक के सवाद लेथे|
"हमर संस्कीरति सिखोथे परियावरण बर मया"
तुलसी बिहाव भर नहीं ढंगलगहा सोचे जाय त हमर संस्कीरति हमला परियावरण ल मया करे अउ मिलके रेहे के संदेस देथे|चाहे तुलसी पूजा होवय,बर पूजा,पीपर पूजा,कि चाहे पूजा म आमा पेड़ के पत्ता ,छाल अउ डारा के हवन बर उपियोग|जम्मों म एके संदेस हे कि मनखे जीव-जंतु अउ परियावरन सब जुरमिल के रहय तभे परकीरती के चालन ठीक रहही|ये सब तिहार के बैज्ञानिक अउ आधयात्मिक दुनो महतव हे|हरेली अउ जम्मों छत्तीसगढ़ी तिहार घलो मनखे के आपसी परेम अउ जीव-जंतु,परियावरन संग मिलके रेहे के संदेस देथे|अइसन संसकीरति के भाग होना सिरतोन म गरब ले भर देथे|
सुनिल शर्मा "नील"
थान खम्हरिया ,बेमेतरा
7828927284
19/11/2015