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ये देखकर कि घर मेरे भरोसे
टिका है
जाने मासूम बचपन कितने बार
बिका है|
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📝सुनिल शर्मा'नील'
थान खम्हरिया,बेमेतरा
7828927284
शुक्रवार, 13 नवंबर 2015
इनका बाल दिवस कब?
भाई दूज के तिहार
भाईदूज के तिहार
जब कुमकुम के रंग म ,बहनी मया के
रंग मिलाथे
अउ माथ म भाई के चाउर संग म तिलक
लगाथे
हवा घलो मीठ लगथे जब भाई-बहनी संग मुस्काथे
इही मया के मुसकान ,तब संगी 'भाई-दूज' कहाथे|
आरती उतार भाई के बहनी सुग्घर आसीस मांगथे
भाई घलो कुछु न कुछु बहनी के हाथ आज मढ़ाथे
करथे अपन बचन के सुरता जउन दे रिहिस राखी म
जिनगी भर संग दुहु कहिके बहनी ल बिसवास देवाथे|
एक दिन अइसन आथे बहिनी मइके छोड़
चले जाथे
चिरई कस जिहां कूदय अंगना ल वो सुन्ना
कर जाथे
फेर हिरदे के मया कहाँ रुकथे देस-परदेस
ले संगी
कोनो कोंटा रहय दूनो झन फेर दू दिन संग
म बीताथे|
सुनिल शर्मा 'नील'
थान खम्हरिया,बेमेतरा
7828927284
13/11/2015
Copyright
गुरुवार, 12 नवंबर 2015
गर्व न आता काम(गोवर्धन पूजा पर#12/11/2015#)
गर्व न आता काम
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उस 'गोवर्धन-गिरधारी' ने
हमको यह सिखलाया है
गर्व न आता काम कभी
इसने सिर सदा झुकाया है
हो बलिष्ठ कितना संकट
एक दिन हार ही जाएगा
प्रेम के आगे नफरत कब
जीता है जो जीत जाएगा|
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📝सुनिल शर्मा 'नील'
थान खम्हरिया,बेमेतरा
7828927284
CR
मंगलवार, 10 नवंबर 2015
रूप चौदस में-कविता(10/11/2015)
तन की सुंदरता न देना पर मन की
दे देना तुम
रूप चौदस के उत्सव में एक कृपा
प्रभु करना तुम
ऐसी सुंदरता किस काम की जो एक
दिन ढल जाती है
मन की सुंदरता जबकि मरने पर भी
रह जाती है
सुंदरता के दम पर देखो व्यक्ति कैसे
इठलाता है
जब झुर्रीमय देह होता है तब पीछे
पछताता है
तन के आकर्षण में देखो कितने इंसान
बर्बाद हुए
जो मन को सुन्दर रखते थे जीते जी
भगवान हुए
जिसमे सुंदरता संग मानवता के गुण
भी होते है
ऐसे महामानव जीवन में बस बिरले ही
होते है
नानक,तुलसी और कबीर सारे हमको
सिखलाते है
सुंदरता आकर्षण है व्यक्ति मेहनत से
पूजे जाते है
जीवन क्षणिक बुलबुला है एक दिन फट
ही जाना है
हर पल में प्रेम भर दे एक दिन सबको जाना है|
सुनिल शर्मा 'नील'
थान खम्हरिया,बेमेतरा
7828927284
सोमवार, 9 नवंबर 2015
ए देवारी ल कुछ अइसन मनाबो - कबिता
"ए देवारी ल कुछ अइसन मनाबो"
ए देवारी ल कुछ अइसन मनाबो
कोनो गरीब के अंधियारी हटाबो
रोवत ल देबो मुसकान चल संगी
जिनगी म ओखर अंजोर बगराबो
दूसर के घर करथे पोतके पररी
खुदके घर ह रहिथे छररी-दररी
चिरहा फटहा पहीनथे लईकामन
उखर लईकाबर कपड़ा बिसाबो
रद्दा म जरे फटाका ल उठाथे
हर बछर कतको मनेमन ललाथे
पछताथे अपन गरीबी के ऊपर
अइसन लईका ल फटाका देवाबो
चाइना लाइट म कइसन तिहार
जा के देख बाट जोहतहे कुम्हार
नइ करन मोल अउ भाव ओखरकर
परन लव माटी के दीयना जलाबो
छत्तीसगढ़िया के हक ल देवाबो
छत्तीसगढ़ी म बोलबो-गोठियाबो
तब मनही सबझन के सुग्घर देवारी
छत्तीसगढ़ के संस्कीरति ल बगराबो
तिहार उही जेन सबला मिलाथे
घर-घर म जेन खुसी ल फ़इलाथे
पत्ती ल झन बाटव तुमन जुवा के
दुःख बाँट कखरो मनखे कहाबो|
📝सुनिल शर्मा नील
थान खम्हरिया,बेमेतरा
7828927284
09/11/2015
©®
शनिवार, 7 नवंबर 2015
असहिष्णुता पर मेरी कविता
(देश में नकली माहौल बनाने और अपने निजी स्वार्थ - (देश में नकली माहौल बनाने और अपने निजी स्वार्थ हेतु देश की छवि विश्वपटल में ख़राब करने हेतु सम्मान लौटाने वालों पर कटाक्ष करती हमारे मित्र कवि सुनिल शर्मा 'नील',थान खम्हरिया की ताजा रचना,कृपा कर मूल रूप में ही शेयर करें ..कवि के नाम या रचनाकार के नाम के साथ छेड़छाड़ न करें|)
रचनाकार-सुनिल शर्मा 'नील'
7828927284
चाटुकारों की फ़ौज निकली देखो माहौल
बनाने को|
जो पाये थे चाँट के तलवे सब पुरस्कार
लौटाने को||
इतनी हिंसा हुई वतन में पहले भी तब क्यों
सोए थे|
सोया था क्यों जमीर सबका तब क्यों न तुम
रोए थे||
कटता था सर हेमराज का जब आतंकी
तलवारो से|
कत्लेआम हुए सिक्खों के जब गलियों -
चौबारों पे||
बोलो तब क्या मानवता अलमारी में रख भूल गए|
तब क्यों बोलो कलम तुम्हारे ये सब लिखना
भूल गए||
तब क्यों न स्मरण हुआ अपना सम्मान
लौटाने की|
एक आदर्श नागरिक,साहित्यकार धरम निभाने की||
साहित्यकार नहीं लगते ये सारे लगते
पिट्ठू है|
जो वो बोले ये बोलेंगे अपने आका के
मिट्ठू है||
जब लौटेंगे चक्र परम और शौर्य ,देश के
वीरों के|
तब मानेगा देश जल रहा असहिष्णुता के
तीरों से||
दुनिया नहीं अबोध भइए सारी चालाकी
समझती है|
ये दुनिया है जहाँ ईमान लिफाफों में बंद
बिकती है||
कलमकार हो कलम से क्रान्ति शंखनाद कर
देते तुम|
रचनाओं के माध्यम से जनता का दर्द लिख
देते तुम||
या फिर अभिनय से अपने कोई सन्देश
ही दे देते|
जिस जनता ने मान दिया कभी उसकी सुध
भी ले लेते||
क्यों उन्मादी बातों से देश की यूँ बदनामी
करते हो|
दर्द लिखो देश का सारा क्यों मनमानी
करते हो||
(रचनाकार-सुनिल शर्मा 'नील')
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suneel.sharama.56808
05/11/2015
गुरुवार, 5 नवंबर 2015
मुक्तक(5/11/2015)
समझदार को इशारा काफी....
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नमकहराम एक हकला सबको राह दिखाने निकला है
असहिष्णुता का देश में सारे आग लगाने
निकला है
याद रहा जिसे सिर्फ कराची,उत्तराखंड-
भुज भूल गया
जिसके रग-रग में मक्कारी धरम सिखाने
निकला है|
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📝सुनिल शर्मा 'नील'
थान खम्हरिया,बेमेतरा
7828927284
05/11/2015
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