सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

अंतस म बइठे रावन ल मारे के संदेस देथे दसेरा

दसेरा हमर देस के बिसेसकर हिन्दू समाज के परमुख तिहार हरय|दसेरा हर बछर कुवार महीना म नवरात के दसवा दिन(दसमी तिथि )म मनाय जाथे|आजे के दिन सतयुग म भगवान राम ह रावन के बध करके दुनिया ल ओखर जुलुम ले मुकति देवाय रहिसे|ओखर सेती दसेरा ल असत उपर सत के जीत के तिहार घलो केहे जाथे| आज के दिन सस्त्रमन के घलो पूजा होथे तेखर सेती येला बिजय परब या बिजयदसमी नाव दे गे हवय|आजे के दिन भगवान राम के रावन उपर जीत के खुसी म गाँव-गाँव अउ सहर मन म मेला भराथे अउ रामलीला के अयोजन होथे|कथा हे कि दुरगा दाई के नव दिन पूजा करके परसन करे के बाद राम भगवान आजे के दिन दाई के असीस ले रावन के बध करे रिहिसे|गाँव-गाँव ले मनखेमन आज मेला घुमे बर आथे|नान-नान लईकामन राम-लखन,बजरंगबली,जामवन के रूप धरके टेकटर म चढ़के झाकी निकलथे|इही राम के सेना ह मइदान(खार)म रखे बुरइ के परतीक रावन के बध करथे|झाकी के आघु-आघु भगवान के निसान(राम-लखन-हनमान अउ सीता के परतीक) ह बाजा संग निकलथे जेखर जघा-जघा लहुटती बेरा पूजा होथे|संगेसंग बाजागाजा संग कई मनखे करतब देखावत कलाबाजी करत रेंगथे अउ अपन ताकत देखाथे|कोनो गदा,कोनो तलवारबाजी त कोनो आगी संग खेल करके अपन करतब ल देखाथे|आनी-बानी के रूप धरे बहरूपिया मन घलो आज घूमत रहिथे|आनी-बानी के झुलना,रचुलीमन लईका अउ बड़ेमन के मन मोहथे|आनी बानी के खउ-खजानी,मिठइ,समोसा,जलेबी,चाट-गुपचुप,पान के ठेला ,फुग्गा,खेलवना के दूकानमन सबके मन ल ललचा डरथे|भीड़ म गोड़ रखे के घलो जघा नइ राहय|रामजी ह सेना संग रावन,मेघनाथ अउ कुम्भकरन के बध ल करथे अउ जम्मों समाज ल अपन अन्तस म बइठे काम,मोह,गुस्सा,गरब,आलस,चोरी,नसा,लालच,झूठ अउ जलनखोरी के दसो रावन रूपी बुरई ल मारे के सन्देस देथे|आज कस पबरीत दिन म घलो कई मनखे गलत काम करथे जेन बने बात नोहय|

"नीलकंठ के दरसन हे सुभ"
दसेरा के दिन नीलकंठ चिरई के दरसन अड़बड़ सुभ माने गेहे|नीलकण्ठ ल पबरीत अउ सुखदायक माने गेहे काबर कि नीलकंठ भगवान भोलेनाथ के घलो नाव हे अउ नीलकंठ ल संकर भगवान के मयारू चिरई केहे गेहे|

"माटी के रावन मारे के हे परथा"
रावन,मेघनाथ अउ कुम्भकरन के बड़का पुतरा तीर म एकठन माटी के अउ रावन बनाय जाथे जेला रावन के बध के बाद मनखे मन ओखर देहे के नाननान माटी ल लाथे ये माटी ल अपन घर के तिजोरी अउ दूकान के गल्ला म रखथे|रावन अंदर लाखो बुरइ होय के बाद घलो ओहा परकान्ड बिद्वान अउ रिसी के रकत रहिसे|राम ह घलो लखनलाल ल रावन करा ले आख़िरी सिक्षा ले बर ओखरे सेती भेजे रहिसे|ओखर इही गुन के सेती ओखर देहे के माटी ल लाने जाथे| एखर से हमला सीख मिलथे कि मनखे ल कोनो मेर ले होवय बने गुन ल धरना चाही|

"बस्तर म होथे पचहत्तर दिन के दसेरा"
भारत म अलग-अलग परदेस म अलग-अलग ढंग ले दसेरा मनाय के परथा हे|कोनो जघा येला देबी ल त कोनो जघा राम भगवान ल समरपित करे गेहे|हमर छत्तीसगढ़ म बस्तर म दसेरा ल दंतेसरी दाई ल समरपित करे गेहे|दंतेसरी ह बस्तर के आराध्य देबी हरय|इहा पचहत्तर दिन के बिस्वपरसिध दसेरा होथे|पहिली दिन ल काछिन गादी कहिथे|दसेरा बर काछिन गादी करा ले आदेस ले जाथे|काछिन गादी एकझन इस्थानी कनिया होथे|काछिन गादी ले राजपरिवार ह आदेस लेथे|ये परथा ह पन्दरही सताब्दी ले चालु होय हे| ओखर बाद जोगी बइठइ,भीतर रैनी(दसेरा)अउ बाहिर रैनी मुरिया दरबार म होथे|अइस्नेहे भारत के दूसर राजमन म उड़ीसा,असम,करनाटक,गुजरात,तमिलनाडु अउ मइसुर म अलग-अलग ढंग ले दसेरा ल मनाथे|

"पीढ़वा म खड़े करके आरती उतारना"
दसेरा मेला ले आय के पाछू घर के माई लोगिन मन बेटा जात मन ल |चउक पुरके पीढ़वा रख के ओखर ऊपर खड़े करवाके आरती उतारथे अउ पइसा धराथे|आरती उतारे के पाछु ये कारन हे कि ओमन ल राम-लखन के सरूप माने जाथे अउ रावन के बध कर के आय के खुसी म उमन ल राम-लखन मान के आरती उतारे जाथे|पूजा के बाद आज पान खाय के घलो बिसेस महतव हे| सुनिल शर्मा"नील" थान खम्हरिया, बेमेतरा(छ.ग.)
7828927284
9755554470 (CR)
12 अक्टूबर

सक्ति के अराधना के परब "नवरात"

हमर छत्तीसगढ़ अउ जम्मों भारत देस म नारी ल दाई कहे गेहे|अइसे कहे जाथे कि नारी(दाई)ह जग म जिनगी के गंगोतरी हरय|अइसन पावन दाई(पुरान अनसार भगवती दाई)जेनला सक्ति कहे जाथे के अराधना के परब 'नवरात'रूप म मनाय जाथे|भगवती दाई के पूजा अउ अराधना बर नवरात ल अड़बड़ सुभ माने जाथे|देवता-धामी ,गन्धरव अउ मनखे सबो नवरात म दाई के पूजा करके ओखर अशीष पाय बर ललाय रहिथे|हिनदू पनचांग अनसार दाई के अराधना के परब नवरात ह बछर म दू बेर आथे|पहिली बेर के नवरात जउन चइत म परथे तउन चइत नवरात अउ दूसर नवरात जउन कुवाँर महीना म परथे तउन कुंवार नवरात या सारदे नवरात(जुड़ म आथे तेखर सेती एक नाव)कहाथे| कुवार के नवरात म संगे-संग राम भगवान के पूजा अउ रामलीला होथे जबकि चइत नवरात म सिरिफ दाई के पूजा होथे|नवरात परब म दाई अराधना ले परसन होके अपन भगत के जम्मों दुःख ल हरलेथे अउ सुख अउ समरीद्धि के अशीष देथे|बरम्हा,बिस्नु अउ महादेव भर ल नहीं अखिल बिस्व के चर-अचर,जर अउ चेतन के रचइया सक्ति दाई(भगवती) हरे|

"गाँव-गाँव जलथे दाई के जोत"
जोत ल दाई के सक्षात सरूप माने गेहे|नवरात म गाँव-गाँव मातादेवाला मन म दाई के दरबार म भगत मन मनकामना जोत जलवाथे| नव दिन-नव रात माता के खूब सेवा गीत अउ भजन गा के दाई ल परसन करे जाथे|नवरात के पाछु ले जोत जलइया मन के दउड़-भाग मन्दिर देवाला म चालू हो जथे|मातदेवाला के साफ़-सफई,पोतई नवरात के तय्यारी म पाछु ले चालू हो जथे|जघा-जघा पारा अउ चउक मन म पंडाल म दाई के मूरति बिराजथे अउ आनी-बानी के झाकी ह मन ल मोहथे|दाई के सोला सिंगार ह अउ पंडाल मन के सजावट ह,चमक-धमक ह भगत मन ल अड़बड़ निक लागथे|एकम के पाछु दिन बिरही(गहू)फिलोय जाथे जेला पूजा के बाद दाई के दरबार म माटी म बोय जाथे|हमर छत्तीसगढ़ राज म दाई के अड़बड़ अकन सिध सक्तिपीठ हे जेमा परमुख रूप म डोंगरगढ़ के बमलाई,रतनपुर के महमाई,दंतेवाड़ा के दन्तेसरी,कोरबा के सर्वमनगला दाई,बेमेतरा के भद्रकाली अउ रायपुर के बंजारी प्रमुख हे|नव दिन तक इहा दुनो नवरात म खूब भीड़ रहिथे|मनखे मन दरसन पाय बर मनौती लेके लाखो के सनखिया म पहुचथे|कतको मनखे रेंगत हजारो के सनखिया म दाई के जयकारा लगावत मनदिर पहुचथे|नव दिन तक तिहार कस लागथे|नव दिन ले सरधालू मनखे मन फल-फूल खाके उपास रहिथे अउ सादापन म नव दिन ल बीताथे|

"दाई के नवरूप के होथे पूजा"
गाँव-गाँव मातादेवाला अउ पनडाल मन म दुरगा दाई के अलग-अलग नव रूप के पूजा होथे|नवरात के बिषय म कहे गेहे- "प्रथममशैलपुत्री च द्वितीयं ब्रम्ह्चारिणी| तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्|| पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यानीति च| सप्तमं कालरात्रिति महागौरीति चाष्टमम्|| नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः| उक्तान्येति नामानि ब्रम्हनैव महात्मनाः|| नवरात के पहिली दिन दाई के पहिली रूप सैलपुत्री के पूजा होथे| सैलपुत्री ल जर जिनिस मन के देबी कहे गेहे|दाई ह अपन पहिली रूप म सनदेसा देथे कि हम अपन भगवान ल जर म घलो देखन|दूसर दिन दाई के ब्रम्ह्चारिणी रूप के पूजा होथे|ब्रम्ह्चारिणी माने जर म चेतन के होना|तीसर दिन तीसरा रूप चन्द्रघण्टा दाई के अराधना करे जाथे|एला बुद्धि के सरूप कहे जाथे|चउथा दिन चउथा सरूप कुष्मांडा के पूजा होथे|कुष्मांडा माने अंडा ल धारन करइया माने अइसन देबी जेन मनखे(नर-नारी )ल सनतान बर गरभधारन के सक्ति देथे|पांचवा दिन स्कंदमाता माने लईका के दाई-ददा के सरूप,छठवा दिन कत्यायनी अरथात भगवती के दाई-ददा के सरूप,सातवा दिन दाई के सातवा सरूप कालरात्रि माने काली माता के पूजा होथे|अइसे कहे जाथे कि जम्मों जर-चेतन ल मरत बेरा काली माता के सक्षात दरसन होथे|दाई के आठवा सरूप महागौरी यानी गोरा रंग अउ रूप वाली,अउ नौवा सरूप सिद्धिदात्री यानी सिद्धि के देवइया के पूजा होथे|ये नव दिन मनखे ह फलफूल भर खाके भक्तिभाव अउ सादगी ले जियत उपास रहिथे|

#कनिया भोजन#
असटमी के दिन हूमहवन के बाद नाननान देबीसरूप नोनी मन ल सुग्घर गोड़ धोवा के महूर लगा के उखर पूजा कर के खीर,सोहारी अउ कलेवा खवाय जाथे|अउ पाव परे जाथे|बिन कनिया भोजन नवरात के पूजा के पूरा फल नई मिलय| #नवरात अउ दसेरा मनाय के पाछु पौरानिक कथा# नवरात मनाय के पाछु एक ठन कथा हे कि महिसासुर नाव के अड़बड़ बलसाली राक्षत रहिसे जेला बरमहा,बिस्नु अउ महादेव तीनो ले नइ हारे के बरदान रहिसे ओखर पाप ल देखके तीनो देव के सक्ति ले दुरगा दाई के जनम होइस जेन राक्षत महिसासुर ल मारके ओखर पाप ले धरती ल बचाइस| दूसर कथा रमायन म निकलथे कि भगवान राम ह रावण ऊपर बिजय पाय खातिर नव दिन तक चण्डी दाई के पूजा करीस अउ दसवा दिन ओखर किरपा ले रावन के बध करीस तेखर सेती नवरात के बाद दसमी के दिन ल दसेरा के रूप म मनाय जाथे ये परब ल असत ऊपर सत के जीत के परब कहे गए हे|

#परब मन म डीजे संस्कीरति के गरहन#
हमर छत्तीसगढ़ म जसगीत ल ढोलक अउ मंजीरा म सुग्घर सकला के गा के सेवा करे अउ दाई ल परसन करे के परथा हे|फेर पाछु कुछ बच्छर ले डीजे के संसकीरटी ल नवा लईका मन अपनावत जात हे जेन आस्था कम अउ देखावा,हल्ला-गुल्ला,तमासा जादा लगथे|हमर नवा पीढी ल ये बात ल समझे ल परही कि दाई ह परेम अउ भक्ति म परसन होथे न कि बिदेशी आनी-बानी के कान के परदा ल फोरैया डीजे म|जम्मों छत्तीसगढ़ के नवा लईकामन ह येला खतम कर सकत हे|हमर छत्तीसगढ़ के चिन्हारी हमर पोठ संस्कीरति ले हे न कि डीजे ले एक्खर सेती परब मन म एखर बिरोध होना चाही अउ बने सादा तरीका ले दाई के नवरात ल मनाना चाही अउ ये गरहन ले हमर छत्तीसगढ़िया संस्कीरति ल बचाना चाही|
सुनिल शर्मा "नील"
थान खम्हरिया,बेमेतरा
(छत्तीसगढ़)
7828927284
9755554470

सक्ति के अराधना के परब "नवरात"

हमर छत्तीसगढ़ अउ जम्मों भारत देस म नारी ल दाई कहे गेहे|अइसे कहे जाथे कि नारी(दाई)ह जग म जिनगी के गंगोतरी हरय|अइसन पावन दाई(पुरान अनसार भगवती दाई)जेनला सक्ति कहे जाथे के अराधना के परब 'नवरात'रूप म मनाय जाथे|भगवती दाई के पूजा अउ अराधना बर नवरात ल अड़बड़ सुभ माने जाथे|देवता-धामी ,गन्धरव अउ मनखे सबो नवरात म दाई के पूजा करके ओखर अशीष पाय बर ललाय रहिथे|हिनदू पनचांग अनसार दाई के अराधना के परब नवरात ह बछर म दू बेर आथे|पहिली बेर के नवरात जउन चइत म परथे तउन चइत नवरात अउ दूसर नवरात जउन कुवाँर महीना म परथे तउन कुंवार नवरात या सारदे नवरात(जुड़ म आथे तेखर सेती एक नाव)कहाथे| कुवार के नवरात म संगे-संग राम भगवान के पूजा अउ रामलीला होथे जबकि चइत नवरात म सिरिफ दाई के पूजा होथे|नवरात परब म दाई अराधना ले परसन होके अपन भगत के जम्मों दुःख ल हरलेथे अउ सुख अउ समरीद्धि के अशीष देथे|बरम्हा,बिस्नु अउ महादेव भर ल नहीं अखिल बिस्व के चर-अचर,जर अउ चेतन के रचइया सक्ति दाई(भगवती) हरे|

"गाँव-गाँव जलथे दाई के जोत"
जोत ल दाई के सक्षात सरूप माने गेहे|नवरात म गाँव-गाँव मातादेवाला मन म दाई के दरबार म भगत मन मनकामना जोत जलवाथे| नव दिन-नव रात माता के खूब सेवा गीत अउ भजन गा के दाई ल परसन करे जाथे|नवरात के पाछु ले जोत जलइया मन के दउड़-भाग मन्दिर देवाला म चालू हो जथे|मातदेवाला के साफ़-सफई,पोतई नवरात के तय्यारी म पाछु ले चालू हो जथे|जघा-जघा पारा अउ चउक मन म पंडाल म दाई के मूरति बिराजथे अउ आनी-बानी के झाकी ह मन ल मोहथे|दाई के सोला सिंगार ह अउ पंडाल मन के सजावट ह,चमक-धमक ह भगत मन ल अड़बड़ निक लागथे|एकम के पाछु दिन बिरही(गहू)फिलोय जाथे जेला पूजा के बाद दाई के दरबार म माटी म बोय जाथे|हमर छत्तीसगढ़ राज म दाई के अड़बड़ अकन सिध सक्तिपीठ हे जेमा परमुख रूप म डोंगरगढ़ के बमलाई,रतनपुर के महमाई,दंतेवाड़ा के दन्तेसरी,कोरबा के सर्वमनगला दाई,बेमेतरा के भद्रकाली अउ रायपुर के बंजारी प्रमुख हे|नव दिन तक इहा दुनो नवरात म खूब भीड़ रहिथे|मनखे मन दरसन पाय बर मनौती लेके लाखो के सनखिया म पहुचथे|कतको मनखे रेंगत हजारो के सनखिया म दाई के जयकारा लगावत मनदिर पहुचथे|नव दिन तक तिहार कस लागथे|नव दिन ले सरधालू मनखे मन फल-फूल खाके उपास रहिथे अउ सादापन म नव दिन ल बीताथे|

"दाई के नवरूप के होथे पूजा"
गाँव-गाँव मातादेवाला अउ पनडाल मन म दुरगा दाई के अलग-अलग नव रूप के पूजा होथे|नवरात के बिषय म कहे गेहे- "प्रथममशैलपुत्री च द्वितीयं ब्रम्ह्चारिणी| तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्|| पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यानीति च| सप्तमं कालरात्रिति महागौरीति चाष्टमम्|| नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः| उक्तान्येति नामानि ब्रम्हनैव महात्मनाः|| नवरात के पहिली दिन दाई के पहिली रूप सैलपुत्री के पूजा होथे| सैलपुत्री ल जर जिनिस मन के देबी कहे गेहे|दाई ह अपन पहिली रूप म सनदेसा देथे कि हम अपन भगवान ल जर म घलो देखन|दूसर दिन दाई के ब्रम्ह्चारिणी रूप के पूजा होथे|ब्रम्ह्चारिणी माने जर म चेतन के होना|तीसर दिन तीसरा रूप चन्द्रघण्टा दाई के अराधना करे जाथे|एला बुद्धि के सरूप कहे जाथे|चउथा दिन चउथा सरूप कुष्मांडा के पूजा होथे|कुष्मांडा माने अंडा ल धारन करइया माने अइसन देबी जेन मनखे(नर-नारी )ल सनतान बर गरभधारन के सक्ति देथे|पांचवा दिन स्कंदमाता माने लईका के दाई-ददा के सरूप,छठवा दिन कत्यायनी अरथात भगवती के दाई-ददा के सरूप,सातवा दिन दाई के सातवा सरूप कालरात्रि माने काली माता के पूजा होथे|अइसे कहे जाथे कि जम्मों जर-चेतन ल मरत बेरा काली माता के सक्षात दरसन होथे|दाई के आठवा सरूप महागौरी यानी गोरा रंग अउ रूप वाली,अउ नौवा सरूप सिद्धिदात्री यानी सिद्धि के देवइया के पूजा होथे|ये नव दिन मनखे ह फलफूल भर खाके भक्तिभाव अउ सादगी ले जियत उपास रहिथे|

#कनिया भोजन#
असटमी के दिन हूमहवन के बाद नाननान देबीसरूप नोनी मन ल सुग्घर गोड़ धोवा के महूर लगा के उखर पूजा कर के खीर,सोहारी अउ कलेवा खवाय जाथे|अउ पाव परे जाथे|बिन कनिया भोजन नवरात के पूजा के पूरा फल नई मिलय| #नवरात अउ दसेरा मनाय के पाछु पौरानिक कथा# नवरात मनाय के पाछु एक ठन कथा हे कि महिसासुर नाव के अड़बड़ बलसाली राक्षत रहिसे जेला बरमहा,बिस्नु अउ महादेव तीनो ले नइ हारे के बरदान रहिसे ओखर पाप ल देखके तीनो देव के सक्ति ले दुरगा दाई के जनम होइस जेन राक्षत महिसासुर ल मारके ओखर पाप ले धरती ल बचाइस| दूसर कथा रमायन म निकलथे कि भगवान राम ह रावण ऊपर बिजय पाय खातिर नव दिन तक चण्डी दाई के पूजा करीस अउ दसवा दिन ओखर किरपा ले रावन के बध करीस तेखर सेती नवरात के बाद दसमी के दिन ल दसेरा के रूप म मनाय जाथे ये परब ल असत ऊपर सत के जीत के परब कहे गए हे|

#परब मन म डीजे संस्कीरति के गरहन#
हमर छत्तीसगढ़ म जसगीत ल ढोलक अउ मंजीरा म सुग्घर सकला के गा के सेवा करे अउ दाई ल परसन करे के परथा हे|फेर पाछु कुछ बच्छर ले डीजे के संसकीरटी ल नवा लईका मन अपनावत जात हे जेन आस्था कम अउ देखावा,हल्ला-गुल्ला,तमासा जादा लगथे|हमर नवा पीढी ल ये बात ल समझे ल परही कि दाई ह परेम अउ भक्ति म परसन होथे न कि बिदेशी आनी-बानी के कान के परदा ल फोरैया डीजे म|जम्मों छत्तीसगढ़ के नवा लईकामन ह येला खतम कर सकत हे|हमर छत्तीसगढ़ के चिन्हारी हमर पोठ संस्कीरति ले हे न कि डीजे ले एक्खर सेती परब मन म एखर बिरोध होना चाही अउ बने सादा तरीका ले दाई के नवरात ल मनाना चाही अउ ये गरहन ले हमर छत्तीसगढ़िया संस्कीरति ल बचाना चाही|
सुनिल शर्मा "नील"
थान खम्हरिया,बेमेतरा
(छत्तीसगढ़)
7828927284
9755554470

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

धन्य है ऐसे सिक्ख वीर

(भारत माता के बेटे इंदरपाल सिंह द्वारा पंजाब में डूबते 4 लोगो के जीवन बचाने पर आभार प्रकट करती और सिक्ख धर्म के गौरवमयी इतिहास में योगदान को प्रदर्शित करती मेरी ताजा रचना समस्त सिक्ख भाइयों को सादर समर्पित है)
रचनाकार-सुनिल शर्मा नील,थान खम्हरिया बेमेतरा(छ.ग.)
7828927284
plz like my official facebook page http//suneel.sharma.56808
धन्य है ऐसे सिक्ख वीर चिड़ियों से बाज लड़ाते है
भारत माता के रक्षा हित हँसते-हँसते मिट जाते
है
जिनके रगों में देशभक्ति का लहू प्रवाहित होता
है
जिनके बलिदानों पर इतिहास आधारित होता
है
जिन गुरुओं के एहसानों का भारतवर्ष आभारी है
नरसिंघों सी ताकत जिनमे सवा लाख पे भारी
है
जिन जाबाजों के दम पर आजादी हमने पाई
है
हिन्दू धर्म की रक्षा में जिन्होंने कितनी लड़ी लड़ाई है
जो जनेउ और तिलक खातिर सूली पे चढ़ जाते है
मानवता के रक्षक वें गुरु अर्जुन और तेग कहाते है
जिन सिंघों के दहाड़ से मुगल सल्तनत डोला
था
धन्य है बेटा वीर भगत जो रंग दे बसन्ती बोला था
जिन साहिबजादों पे देश के हर माता को नाज
है
खालसा के उन रणबांकुरों को बारम्बार प्रणाम
है
जिन सिक्खों के उदघोषों से शत्रु थरथर थर्राते
है
लोहा लेने में जिनसे कातिल तूफां भी घबराते
है
जात-पात का भेद न रखना हमको ये सिखलाते है
गुरूद्वारे के लंगर सारे समता का पाठ पढ़ाते
है
धर्म यही जिसने 'औरंग' के गर्व को चूर-चूर किया
न बदला मजहब बल्कि सर अपना देना कुबूल किया
सरल,सहज,उद्ममशीलता जिनके चरित्र की शान है
कड़ा,कंघा,कृपाण,केश और कच्छा जिनका मान है
एक ओंकार और सतनाम जिस धर्म का आधार है
समानता एवं वीरता ही जिन सिंघों का संस्कार
है
कहें 'सुनिल नील' पाठ एक सिक्खों से हरकोई सीख जाएँ
भारत माता के लिए जिए इसके खातिर ही मिट जाए|
कवि सुनिल शर्मा 'नील'
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धन्य है ऐसे सिक्ख वीर

(भारत माता के बेटे इंदरपाल सिंह द्वारा पंजाब में डूबते 4 लोगो के जीवन बचाने पर आभार प्रकट करती और सिक्ख धर्म के गौरवमयी इतिहास में योगदान को प्रदर्शित करती मेरी ताजा रचना समस्त सिक्ख भाइयों को सादर समर्पित है)
रचनाकार-सुनिल शर्मा नील,थान खम्हरिया बेमेतरा(छ.ग.)
7828927284
plz like my official facebook page http//suneel.sharma.56808
धन्य है ऐसे सिक्ख वीर चिड़ियों से बाज लड़ाते है
भारत माता के रक्षा हित हँसते-हँसते मिट जाते
है
जिनके रगों में देशभक्ति का लहू प्रवाहित होता
है
जिनके बलिदानों पर इतिहास आधारित होता
है
जिन गुरुओं के एहसानों का भारतवर्ष आभारी है
नरसिंघों सी ताकत जिनमे सवा लाख पे भारी
है
जिन जाबाजों के दम पर आजादी हमने पाई
है
हिन्दू धर्म की रक्षा में जिन्होंने कितनी लड़ी लड़ाई है
जो जनेउ और तिलक खातिर सूली पे चढ़ जाते है
मानवता के रक्षक वें गुरु अर्जुन और तेग कहाते है
जिन सिंघों के दहाड़ से मुगल सल्तनत डोला
था
धन्य है बेटा वीर भगत जो रंग दे बसन्ती बोला था
जिन साहिबजादों पे देश के हर माता को नाज
है
खालसा के उन रणबांकुरों को बारम्बार प्रणाम
है
जिन सिक्खों के उदघोषों से शत्रु थरथर थर्राते
है
लोहा लेने में जिनसे कातिल तूफां भी घबराते
है
जात-पात का भेद न रखना हमको ये सिखलाते है
गुरूद्वारे के लंगर सारे समता का पाठ पढ़ाते
है
धर्म यही जिसने 'औरंग' के गर्व को चूर-चूर किया
न बदला मजहब बल्कि सर अपना देना कुबूल किया
सरल,सहज,उद्ममशीलता जिनके चरित्र की शान है
कड़ा,कंघा,कृपाण,केश और कच्छा जिनका मान है
एक ओंकार और सतनाम जिस धर्म का आधार है
समानता एवं वीरता ही जिन सिंघों का संस्कार
है
कहें 'सुनिल नील' पाठ एक सिक्खों से हरकोई सीख जाएँ
भारत माता के लिए जिए इसके खातिर ही मिट जाए|
कवि सुनिल शर्मा 'नील'
(कृपया मूल रूप में ही शेयर करें कविता से छेड़खानी न करें)

धन्य है ऐसे सिक्ख वीर

(भारत माता के बेटे इंदरपाल सिंह द्वारा पंजाब में डूबते 4 लोगो के जीवन बचाने पर आभार प्रकट करती और सिक्ख धर्म के गौरवमयी इतिहास में योगदान को प्रदर्शित करती मेरी ताजा रचना समस्त सिक्ख भाइयों को सादर समर्पित है)
रचनाकार-सुनिल शर्मा नील,
थान खम्हरिया बेमेतरा(छ.ग.)
7828927284 plz like my official facebook page http//suneel.sharma.56808
धन्य है ऐसे सिक्ख वीर चिड़ियों से बाज लड़ाते है
भारत माता के रक्षा हित जो कुर्बां हो जाते
है
जिनके रगों में देशभक्ति का लहू प्रवाहित होता
है
जिनके बलिदानों पर इतिहास आधारित होता
है
जिन गुरुओं के एहसानों का भारतवर्ष आभारी है
नरसिंहों सी ताकत जिनमे सवा लाख पे भारी
है
जिन जाबाजों के दम पर ही आजादी हमने पाई है
हिन्दू धर्म की रक्षा में जिन्होंने कितनी लड़ी लड़ाई है
जो जनेउ और तिलक के खातिर सूली पे चढ़ जाते है
मानवता के रक्षक वें गुरु अर्जुन-तेग कहाते
है
जिन सिंहों के दहाड़ से मुगल सल्तनत डोला
था
धन्य है बेटा वीर भगत जो रंग दे बसन्ती बोला था
जिन साहिबजादों पे देश के हर माता को नाज
है
खालसा के उन रणबांकुरों को बारम्बार प्रणाम
है
जिन सिक्खों के उदघोषों से शत्रु सारे थर्राते
है
जिनसे टकराने में कातिल तूफां भी घबराते
है
जात-पात का भेद क्या रखना हमको ये सिखलाते है
गुरूद्वारे के लंगर सारे समता का पाठ पढ़ाते
है
धर्म यही जिसने 'औरंग' के घमंड को चूर-चूर किया
न बदला मजहब बल्कि सर अपना देना कुबूल किया
सरल,सहज,उद्मशीलता जिनके चरित्र की शान है
कड़ा,कंघा,कृपाण,केश और कच्छा जिसका मान है
एक ओंकार और सतनाम जिस धर्म का आधार है
समानता एवं वीरता ही जिन लोगो का संस्कार
है
कहें 'सुनिल नील' पाठ एक सिक्खों से हर कोई सीख जाएँ
भारत माता के लिए जिएँ इसके खातिर ही मिट जाए|
कवि सुनिल शर्मा 'नील'
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धन्य है ऐसे सिक्ख वीर

(भारत माता के बेटे इंदरपाल सिंह द्वारा पंजाब में डूबते 4 लोगो के जीवन बचाने पर आभार प्रकट करती और सिक्ख धर्म के गौरवमयी इतिहास में योगदान को प्रदर्शित करती मेरी ताजा रचना समस्त सिक्ख भाइयों को सादर समर्पित है)
रचनाकार-सुनिल शर्मा नील,
थान खम्हरिया बेमेतरा(छ.ग.)
7828927284 plz like my official facebook page http//suneel.sharma.56808
धन्य है ऐसे सिक्ख वीर चिड़ियों से बाज लड़ाते है
भारत माता के रक्षा हित जो कुर्बां हो जाते
है
जिनके रगों में देशभक्ति का लहू प्रवाहित होता
है
जिनके बलिदानों पर इतिहास आधारित होता
है
जिन गुरुओं के एहसानों का भारतवर्ष आभारी है
नरसिंहों सी ताकत जिनमे सवा लाख पे भारी
है
जिन जाबाजों के दम पर ही आजादी हमने पाई है
हिन्दू धर्म की रक्षा में जिन्होंने कितनी लड़ी लड़ाई है
जो जनेउ और तिलक के खातिर सूली पे चढ़ जाते है
मानवता के रक्षक वें गुरु अर्जुन-तेग कहाते
है
जिन सिंहों के दहाड़ से मुगल सल्तनत डोला
था
धन्य है बेटा वीर भगत जो रंग दे बसन्ती बोला था
जिन साहिबजादों पे देश के हर माता को नाज
है
खालसा के उन रणबांकुरों को बारम्बार प्रणाम
है
जिन सिक्खों के उदघोषों से शत्रु सारे थर्राते
है
जिनसे टकराने में कातिल तूफां भी घबराते
है
जात-पात का भेद क्या रखना हमको ये सिखलाते है
गुरूद्वारे के लंगर सारे समता का पाठ पढ़ाते
है
धर्म यही जिसने हुमायूँ के घमंड को चूर-चूर किया
न बदला मजहब बल्कि सर अपना देना कुबूल किया
सरल,सहज,उद्मशीलता जिनके चरित्र की शान है
कड़ा,कंघा,कृपाण,केश और कच्छा जिसका मान है
एक ओंकार और सतनाम जिस धर्म का आधार है
समानता एवं वीरता ही जिन लोगो का संस्कार
है
कहें 'सुनिल नील' पाठ एक सिक्खों से हर कोई सीख जाएँ
भारत माता के लिए जीएँ इसके खातिर ही मिट जाए|
कवि सुनिल शर्मा 'नील'
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